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समाजसेवी सुनील कुमार दे ने पढ़ाई में मातृभाषा को अनिवार्य करने की कि मांग 

Suresh Mahapatra
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समाजसेवी सुनील कुमार दे ने पढ़ाई में मातृभाषा को अनिवार्य करने की कि मांग 

 

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समाजसेवी सुनील कुमार दे ने पढ़ाई में मातृभाषा को अनिवार्य करने की कि मांग पोटका से सुरेश कुमार महापात्र की रिपोर्ट समाजसेवी सह साहित्यकार सुनील कुमार दे कहा मातृभाषा हर विद्यालय में अनिवार्य रूप से पढ़ाई होनी चाहिए।मातृभाषा मातृ दुग्ध के समान है।इसलिए हर व्यक्ति को अपनी मातृभाषा का ज्ञान होना चाहिए।कोई भी भाषा शिक्षा के लिए बाधक नहीं है।अगर किसी बच्चे के अंदर मेधा है तो उसको भाषा आगे बढ़ने में रोक नहीं सकती।किसी भी भाषा में शिक्षा ले जरूर वह आगे बढ़ेगा।उन्होंने सवाल खड़ा करते हुए कहा रशिया, चीन,जापान,जर्मनी आदि में अंग्रेजी की पढ़ाई नहीं होती,अपनी मातृभाषा को लेकर वे सारे देश कैसे आगे बढ़ रहा है।बोलने का अर्थ भाषा शिक्षा का बाधक नहीं है।पहले देश के हर राज्य में मातृभाषा की पढ़ाई होती थी और भारत के संविधान में भी प्राइमरी शिक्षा मातृ भाषा में देना है यह विधान है लेकिन अनेक राज्य में इसका पालन नहीं होता है उसमें से हमारा झारखंड राज्य एक है।करीब 30 साल पहले बंगला,उड़िया, उर्दू आदि की शिक्षा हिन्दी और अंग्रेजी के साथ दिया जाता था।राज्य त्रिभाषी शिक्षा की व्यवस्था थी।बंगला मीडियम,उड़िया मीडियम,हिंदी मीडियम स्कूल भी होता था लेकिन झारखंड बनने के बाद विद्यालय में केवल हिंदी और अंग्रेजी की पढ़ाई होती है।बच्चे अपनी मातृभाषा में पढ़ाई करना चाहते हैं लेकिन सरकार का कोई व्यवस्था नहीं है जो बहुत ही दुःख की बात है।सरकार को सभी भाषा को सम्मान देना चाहिए और इसके लिए हर विद्यालय में मातृभाषा में शिक्षा को अनिवार्य करने की जरूरत है ताकि बच्चे मातृभाषा शिखने से बंचित न रह जाय।

 

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पोटका से सुरेश कुमार महापात्र की रिपोर्ट 

 

 

 

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समाजसेवी सह साहित्यकार सुनील कुमार दे कहा मातृभाषा हर विद्यालय में अनिवार्य रूप से पढ़ाई होनी चाहिए।मातृभाषा मातृ दुग्ध के समान है।इसलिए हर व्यक्ति को अपनी मातृभाषा का ज्ञान होना चाहिए।कोई भी भाषा शिक्षा के लिए बाधक नहीं है।अगर किसी बच्चे के अंदर मेधा है तो उसको भाषा आगे बढ़ने में रोक नहीं सकती।किसी भी भाषा में शिक्षा ले जरूर वह आगे बढ़ेगा।उन्होंने सवाल खड़ा करते हुए कहा रशिया, चीन,जापान,जर्मनी आदि में अंग्रेजी की पढ़ाई नहीं होती,अपनी मातृभाषा को लेकर वे सारे देश कैसे आगे बढ़ रहा है।बोलने का अर्थ भाषा शिक्षा का बाधक नहीं है।पहले देश के हर राज्य में मातृभाषा की पढ़ाई होती थी और भारत के संविधान में भी प्राइमरी शिक्षा मातृ भाषा में देना है यह विधान है लेकिन अनेक राज्य में इसका पालन नहीं होता है उसमें से हमारा झारखंड राज्य एक है।करीब 30 साल पहले बंगला,उड़िया, उर्दू आदि की शिक्षा हिन्दी और अंग्रेजी के साथ दिया जाता था।राज्य त्रिभाषी शिक्षा की व्यवस्था थी।बंगला मीडियम,उड़िया मीडियम,हिंदी मीडियम स्कूल भी होता था लेकिन झारखंड बनने के बाद विद्यालय में केवल हिंदी और अंग्रेजी की पढ़ाई होती है।बच्चे अपनी मातृभाषा में पढ़ाई करना चाहते हैं लेकिन सरकार का कोई व्यवस्था नहीं है जो बहुत ही दुःख की बात है।सरकार को सभी भाषा को सम्मान देना चाहिए और इसके लिए हर विद्यालय में मातृभाषा में शिक्षा को अनिवार्य करने की जरूरत है ताकि बच्चे मातृभाषा शिखने से बंचित न रह जाय।

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