खेल-
भारत खेलों की दुनिया में एक लंबे इतिहास और समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर वाला देश है, जहां कबड्डी, कुश्ती, खो-खो, गिल्ली-डंडा और अन्य पारंपरिक खेल सदियों से लोगों की जीवनशैली का हिस्सा रहे हैं। लेकिन जब बात आधुनिक प्रतिस्पर्धी खेलों की होती है, विशेषकर ओलंपिक या विश्व स्तरीय आयोजनों की, तो भारत अक्सर अपेक्षाओं से पीछे रह जाता है। सवाल यह है कि एक अरब से अधिक आबादी वाला देश, जहां युवाओं की संख्या अपार है, वह खेल उपलब्धियों में लगातार पिछड़ेपन का सामना क्यों करता है। इसका उत्तर हमें अपनी खेल नीति, संरचना और दृष्टिकोण में ढूँढना होगा। और यहीं यह सत्य सामने आता है कि भारत को खेलों में सफल होने के लिए दूसरों से सीखने की ज़रूरत है। विश्व खेल मंच पर नज़र डालें तो चीन, जापान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, रूस या यहां तक कि छोटे-छोटे देश भी पदक तालिका में भारत से कहीं आगे नज़र आते हैं। इन देशों में खेल को केवल मनोरंजन या फिटनेस का साधन नहीं माना जाता, बल्कि राष्ट्र निर्माण और वैश्विक प्रतिष्ठा का अभिन्न हिस्सा समझा जाता है। यही सोच उन्हें सुनियोजित नीतियों की ओर ले जाती है। उदाहरण के तौर पर चीन की खेल नीति लें, जहां राज्य स्तर से ही खिलाड़ियों की पहचान कर उन्हें प्रशिक्षण, संसाधन और मनोवैज्ञानिक समर्थन प्रदान किया जाता है। वहां खेल केवल किसी एक अकादमी का विषय नहीं है, बल्कि पूरे राष्ट्र की प्राथमिकता है।

जापान का उदाहरण भी उल्लेखनीय है। वहां तकनीकी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से खिलाड़ियों की तैयारी की जाती है। आहार विशेषज्ञ, फिटनेस वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और तकनीकी प्रशिक्षक सभी मिलकर एक खिलाड़ी को तैयार करते हैं। इसके अलावा जापान ने अपनी शिक्षा प्रणाली में खेलों को गहराई से जोड़ा है, जिससे स्कूली स्तर से ही अनुशासन, फिटनेस और प्रतिस्पर्धा का भाव बच्चों में विकसित हो जाता है। इसी कारण वे केवल बेसबॉल या जूडो ही नहीं, बल्कि तैराकी, जिम्नास्टिक और एथलेटिक्स में भी लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हैं। इसके विपरीत भारत की स्थिति देखें तो यहाँ खेलों को अक्सर पढ़ाई के बाद बचा हुआ समय बिताने की गतिविधि के रूप में देखा जाता है। शिक्षा व्यवस्था इतनी दबावपूर्ण है कि बच्चों को खेल में करियर बनाने का मौका ही नहीं मिल पाता। माता-पिता और समाज की मानसिकता भी यही रहती है कि पढ़ाई के बिना भविष्य सुरक्षित नहीं है, जबकि खेल को हमेशा अनिश्चितता से जोड़ा जाता है। इस सोच ने हमारी खेल संस्कृति को कमजोर किया है।भारतीय खेल ढांचे की सबसे बड़ी कमजोरी बुनियादी ढांचे की कमी है। गांवों और कस्बों में बच्चों के पास मैदान ही नहीं होते, जहां होते हैं वहां सुविधाएं नहीं होतीं। प्रशिक्षकों की कमी, उचित पोषण का अभाव और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दे खेल प्रतिभाओं को शुरुआती स्तर पर ही खत्म कर देते हैं। जहां सुविधा मिलती भी है, वह केवल बड़े शहरों या कुछ चुनिंदा संस्थानों तक सीमित रहती है। भारत के सामने दूसरा बड़ा संकट खेल प्रबंधन और राजनीति का है। अक्सर देखा जाता है कि खेल संघों में नेतृत्व वे लोग करते हैं जिन्हें खेल से कोई सीधा सरोकार नहीं रहा। वे राजनीति और शक्ति प्रदर्शन के कारण इन पदों पर काबिज होते हैं। परिणाम यह होता है कि खिलाड़ियों की ज़रूरतों से अधिक प्राथमिकता सत्ता और रसूख को मिलती है। इसके उलट, अन्य देशों में खेल संघों में खिलाड़ी रह चुके लोग या खेल विशेषज्ञ नेतृत्व की भूमिका निभाते हैं। खेलों में भारत को यह भी सीखना होगा कि खिलाड़ियों को केवल भौतिक संसाधन ही नहीं, बल्कि मानसिक दृढ़ता और आत्मविश्वास का भी प्रशिक्षण दिया जाए। उदाहरण के लिए, अमेरिका में खिलाड़ी के साथ मनोवैज्ञानिकों की पूरी टीम रहती है, जो उसके आत्मविश्वास, दबाव और मानसिक स्वास्थ्य पर काम करती है। भारत में आज भी मानसिक स्वास्थ्य को लेकर खुलापन नहीं है। दबाव में टूटना, आत्महत्या तक की घटनाएं और करियर छोड़ देना हमारी व्यवस्था की खामियों को उजागर करता है। इसके अलावा भारत को पोषण विज्ञान से भी सबक लेना होगा। खिलाड़ियों को उच्चस्तरीय आहार और फिटनेस योजना चाहिए, लेकिन अक्सर उन्हें स्थानीय स्तर पर पर्याप्त प्रोटीन तक नहीं मिलता। जब तक शरीर मजबूत नहीं होगा, तब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा में टिकना मुश्किल है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि छोटे देश, जैसे जमैका या केन्या, विशेष खेलों में विश्व चैंपियन बनते हैं क्योंकि उन्होंने अपनी क्षमता और परिस्थिति के अनुसार खेलों का चुनाव किया है। जमैका ने एथलेटिक्स में और केन्या ने लंबी दूरी की दौड़ में वैश्विक नेतृत्व हासिल किया। भारत को भी यह रणनीति अपनानी होगी कि किन खेलों में हमारे पास प्राकृतिक और सांस्कृतिक रूप से अधिक क्षमता है, और वहां संसाधनों का केंद्रित निवेश किया जाए। खेल केवल पदक जीतने का साधन नहीं, बल्कि समाज में ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार करने का जरिया हैं। जब कोई खिलाड़ी ओलंपिक या विश्व कप में तिरंगा लहराता है, तो वह करोड़ों भारतीयों के मन में गर्व और प्रेरणा का संचार करता है। इसलिए खेलों में निवेश केवल आर्थिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी आवश्यक है।आज भारत को यह स्वीकार करना होगा कि केवल भावनाओं और नारेबाज़ी से खेल नहीं जीते जाते। इसके लिए ठोस नीति, दीर्घकालिक योजना और अनुशासन चाहिए। हमें चीन और जापान की संगठन क्षमता, अमेरिका की तकनीक और मनोविज्ञान आधारित प्रशिक्षण, यूरोप की खेल संस्कृति और अफ्रीकी देशों की प्राकृतिक क्षमता से प्रेरणा लेनी होगी। भारत की युवा आबादी को सही दिशा और अवसर मिले तो यह देश केवल आईटी और विज्ञान ही नहीं, खेलों में भी महाशक्ति बन सकता है। खेल का भविष्य उस दिन उज्ज्वल होगा जब हम बच्चों को मैदान में खेलने का समय देंगे, जब हम शिक्षा और खेल के बीच संतुलन बनाएंगे, जब हम राजनीति से ऊपर उठकर खिलाड़ियों के हित में नीतियां बनाएंगे और जब हम यह सीखेंगे कि सफलता केवल प्रतिभा पर नहीं, बल्कि अनुशासन, मेहनत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर निर्भर करती है। भारत को खेलों में विश्व पटल पर पहचान दिलाने के लिए यही सबसे बड़ा सबक है, जो उसे दूसरों से सीखना होगा।

