रक्तदान पखवाड़े से मिली राहत, लेकिन एन.ए.टी जांच की कमी बनी बड़ी चुनौती
नवंबर में बढ़े शिविर, दिसंबर में आई गिरावट; थैलेसीमिया बच्चों के सुरक्षित रक्त पर संकट की आशंका
हजारीबाग | झारखंड में सुरक्षित रक्त उपलब्ध कराने को लेकर सरकार द्वारा किए गए प्रयासों का सकारात्मक असर नवंबर माह में देखने को मिला, जब रक्तदान शिविरों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई। हालांकि दिसंबर में यह संख्या घट गई, जिससे भविष्य में रक्त की उपलब्धता को लेकर चिंताएं बढ़ने लगी हैं। यह जानकारी वॉलंटरी ब्लड डोनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष और “ब्लड मैन” के नाम से चर्चित निर्मल जैन ने दी।
चाईबासा में थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों को एचआईवी संक्रमित रक्त चढ़ने की घटना के बाद सरकार का ध्यान ब्लड बैंकों की जांच और रखरखाव व्यवस्था पर केंद्रित हुआ। पूर्व में एलाइजा और किट आधारित जांच में विंडो पीरियड के कारण संक्रमण की संभावना बनी रहती थी। इस जोखिम को कम करने के लिए सरकार ने कुछ स्थानों पर NAT (न्यूक्लिक एसिड टेस्ट) जांच की सुविधा शुरू की, जिससे मरीजों को अधिक सुरक्षित रक्त मिलने लगा।
सरकारी जांच में कई ब्लड बैंकों के पास लाइसेंस और उचित रखरखाव की व्यवस्था नहीं पाई गई, जिसके चलते उन्हें बंद कर दिया गया। वहीं रक्त की कमी को दूर करने के उद्देश्य से 12 से 28 नवंबर तक पूरे झारखंड में “रक्तदान पखवाड़ा” चलाया गया। इस अभियान में सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। हजारीबाग में शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 40 रक्तदान शिविरों के माध्यम से 695 रक्तदाताओं ने रक्तदान किया। इनमें वॉलंटरी ब्लड डोनर्स एसोसिएशन द्वारा लगाए गए 14 शिविरों से 322 यूनिट रक्त संग्रह किया गया, जो एक रिकॉर्ड माना जा रहा है।
हालांकि, एन.ए.टी जांच की सुविधा केवल रांची में उपलब्ध होने के कारण आसपास के जिलों के ब्लड बैंकों को नमूने वहीं भेजने पड़ते हैं। जांच रिपोर्ट में देरी और कई बार मशीन खराब होने से तीन से चार दिन तक रिपोर्ट न आने की स्थिति बन जाती है। परिणामस्वरूप ब्लड बैंक में पर्याप्त रक्त होने के बावजूद मरीजों को समय पर रक्त उपलब्ध नहीं हो पाता, जिससे हंगामे की स्थिति भी उत्पन्न हो रही है।
निर्मल जैन ने बताया कि एसोसिएशन का लगातार प्रयास रहा है कि बिना रिप्लेसमेंट के जरूरतमंदों को रक्त उपलब्ध कराया जाए। इसी सोच के तहत हजारीबाग में 300 से अधिक थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों और एचआईवी मरीजों को उनकी पहचान गोपनीय रखते हुए रक्त उपलब्ध कराया गया, ताकि सामाजिक भेदभाव से उन्हें बचाया जा सके। चाईबासा में पहचान उजागर होने से पीड़ितों को गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि रक्तदान शिविरों की संख्या में गिरावट जारी रही और पर्याप्त जागरूकता नहीं फैली, तो आने वाले समय में थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इसके लिए सरकार को और सशक्त पहल करने की आवश्यकता है, ताकि बिना रिप्लेसमेंट सभी जरूरतमंदों को सुरक्षित रक्त मिल सके और थैलेसीमिया बच्चों के अधिकारों का हनन न हो।
निर्मल जैन ने हजारीबाग के शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में लंबे समय से एन.ए.टी टेस्टेड रक्त उपलब्ध कराने के लिए सिविल सर्जन डॉ. अशोक कुमार, अधीक्षक अनुकरण पूर्ति और प्रभारी डॉ. नीरज कुमार को विशेष रूप से साधुवाद दिया।

