युद्ध में अनाथ हुए बच्चे सबसे कमज़ोर पीड़ित अक्सर अनदेखे रह जाते हैं,और रह जाती है उनकी आवाज़ अनसुनी : मुकुंद साव
चौपारण
हर साल 6 जनवरी को विश्व युद्ध अनाथ दिवस मनाया जाता है ताकि युद्ध के कारण अनाथ हुए लाखों बच्चों के बारे में जागरूकता फैलाई जा सके। उक्त बातें विश्व युद्ध अनाथ दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय मानवाधिकार एसोसिएशन झारखंड प्रदेश प्रभारी मुकुंद साव ने कहा। उन्होंने कहा है कि युद्ध का बच्चों पर गहरा और बहुआयामी प्रभाव पड़ता है। माता-पिता को खोने से वे अनिश्चितता के दौर में डूब जाते हैं, भावनात्मक रूप से आहत होते हैं, आर्थिक रूप से तंगी में आ जाते हैं और आवश्यक देखभाल से वंचित हो जाते हैं। उन्हें न केवल माता-पिता के प्यार और मार्गदर्शन की कमी का सामना करना पड़ता है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और एक स्थिर परवरिश प्राप्त करने में भी महत्वपूर्ण बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
मुकुंद साव ने बताया है कि इस दिवस की शुरुआत फ्रांसीसी संगठन एसओएस एनफैंट्स एन डेट्रेसेस की पहल से हुई, जो अनाथ और वंचित बच्चों की सहायता के लिए समर्पित है। संयुक्त राष्ट्र ने 6 जनवरी, 2006 को इस दिवस को औपचारिक रूप से मान्यता दी और विश्व भर में युद्ध अनाथों द्वारा सामना की जाने वाली विशिष्ट चुनौतियों के समाधान की आवश्यकता को स्वीकार किया। युद्ध अनाथ बच्चों को अपनों को खोने के सदमे से लेकर उचित देखभाल और संसाधनों के अभाव में अनिश्चित भविष्य का सामना करने जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यह वार्षिक आयोजन एक आह्वान है, जो समुदायों और व्यक्तियों से इन कमजोर बच्चों के समर्थन में एकजुट होने का आग्रह करता है।
यह दिन युद्ध अनाथ बच्चों के अधिकारों और कल्याण की रक्षा करने वाली नीतियों के लिए जागरूकता बढ़ाने, संसाधन जुटाने और वकालत करने के लिए समर्पित है। मुकुंद साव ने आम जनमानस से अनुरोध किया है कि युद्ध,आपदा इत्यादि में अनाथ हुए बच्चों पर हम सबको बढ़ चढ़कर सहयोग करना चाहिए, ताकि वो भी आम लोगों की तरह जी सके। राष्ट्रीय मानवाधिकार एसोसिएशन झारखंड प्रदेश जो प्रदेश स्तर पर किसी भी तरह का मानवाधिकार का हनन का मामला को सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध है इसके लिए कोडरमा जिला अंतर्गत उरवा मोड स्थित सिल्वर लेक व्यू रिसोर्ट में राष्ट्रीय सेमिनार सह कार्यशाला का आयोजन किया गया है जिसमें देश भर के लगभग 500 प्रतिनिधि भाग लेंगे।

