काठमांडू-
उत्कर्ष तिवारी
- नेपाल की राजधानी काठमांडू इस वक़्त सियासी और सामाजिक हलचल का केंद्र बन चुकी है। सोशल मीडिया बैन और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ ज़ेन ज़ी की अगुवाई में शुरू हुआ आंदोलन अब इतिहास की सबसे भयावह बगावतों में गिना जा रहा है। सड़कों पर युवा प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों की झड़पों में अब तक इक्कीस लोगों की जान जा चुकी है। हालात बेकाबू होते ही प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने मंगलवार को राष्ट्रप
ति राम चंद्र पौडेल को अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया।
ओली के इस्तीफ़े से पहले ही उनकी सरकार की पकड़ ढीली पड़ चुकी थी। गठबंधन सहयोगियों, नेपाली कांग्रेस और नेपाली समाज पार्टी के मंत्रियों ने बगावत करते हुए मंत्रिमंडल छोड़ दिया था। राजनीतिक दबाव और जनाक्रोश की आँधी में घिरे ओली ने अंततः पद छोड़कर पीछे हटने का रास्ता चुना।
त्यागपत्र में ओली ने लिखा है कि वे संविधान के अनुच्छेद 77 (1) (ए) के तहत पद से हट रहे हैं ताकि असामान्य हालात में राजनीतिक समाधान तलाशा जा सके। मगर सवाल उठ रहा है कि क्या केवल इस्तीफ़ा देने से काठमांडू की सड़कों पर धधकती आग शांत हो पाएगी?कर्फ़्यू के बावजूद मंगलवार को राजधानी दहल उठी। सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने सिंह दरबार और संसद भवन पर धावा बोला, न्यू बानेश्वर स्थित संसद भवन में आगजनी की गई और नारे गूंजते रहे। ओली इस्तीफ़ा दो! सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में ओली के भक्तपुर स्थित आवास को जलते हुए देखा जा सकता है, वहीं ग़ुस्साई भीड़ ने पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के घर पर भी हमला बोल दिया।


हालात इतने भयावह हो गए कि त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे तक को बंद करना पड़ा। नागरिक उड्डयन प्राधिकरण ने धुएँ और सुरक्षा जोखिम का हवाला देते हुए सभी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानें रोक दीं। पूरे काठमांडू घाटी को एक युद्धक्षेत्र जैसा माहौल घेरे हुए है। नेपाली समाचार के रिपोर्ट के मुताबिक, देश के कई बड़े अख़बारों ने विशेष संपादकीय छापकर ओली से इस्तीफ़ा देने की माँग की थी। जनता के ग़ुस्से और मीडिया के दबाव के बीच अंततः ओली को गद्दी छोड़नी पड़ी। अब सवाल यह है कि नेपाल की राजनीति का अगला चेहरा कौन होगा? क्या ज़ेन ज़ी की यह बगावत सत्ता का समीकरण बदल देगी या फिर देश और गहरे संकट में धकेल दिया जाएगा? काठमांडू की सड़कों पर धधकती आग और हवा में उठता धुआँ इस सवाल का जवाब आज भी अनसुलझा छोड़ रहे हैं।

