शहीद शेख भिखारी व टिकैत उमरांव सिंह की 169वीं शहादत दिवस पर चुटूपालू घाटी में होगा श्रद्धांजलि कार्यक्रम : मो जहांगीर अंसारी
हजारीबाग
ऑल इंडिया मोमिन कॉन्फ्रेंस हजारीबाग के जिला अध्यक्ष मो. जहांगीर अंसारी ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बताया कि 8 जनवरी 2025 को शहीद टिकैत उमरांव सिंह एवं शहीद शेख भिखारी उर्फ बोखारी की 169वीं शहादत दिवस के अवसर पर हजारीबाग सहित पूरे राज्य से अकीदतमंद रामगढ़ जिले के चुटूपालू घाटी स्थित शहादत स्थल पहुंचकर खराजे अकीदत पेश करेंगे। मो. जहांगीर अंसारी ने झारखंडवासियों, विशेषकर हजारीबाग जिले के नागरिकों से अपील की कि वे बड़ी संख्या में शहादत स्थल पर पहुंचकर देश के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले वीर सपूतों को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करें। उन्होंने कहा कि शहीदों की मजारों पर हर वर्ष लगने वाले मेले और वहां उमड़ने वाली भीड़ इस बात का प्रमाण हैं कि वतन पर मरने वालों की कुर्बानी कभी भुलाई नहीं जा सकती। इस अवसर पर जिला अध्यक्ष मो. जहांगीर अंसारी ने शहीद शेख भिखारी के जीवन पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए बताया कि उनका जन्म 2 अक्टूबर 1819 ई. को झारखंड के रांची जिले के ओरमांझी थाना क्षेत्र अंतर्गत होप्टे गांव में एक बुनकर अंसारी परिवार में हुआ था। वे बचपन से ही अपने पारिवारिक पेशे के तहत मोटे कपड़े तैयार कर बाजार में बेचते थे और इसी से परिवार का भरण-पोषण करते थे। कुशाग्र बुद्धि और अदम्य साहस के धनी शेख भिखारी मात्र 20 वर्ष की आयु में छोटानागपुर के महाराज के यहां नौकरी करने लगे और अपनी प्रतिभा के बल पर शीघ्र ही राजा के दरबार में महत्वपूर्ण स्थान बना लिया। बाद में बड़कागढ़ जगन्नाथपुर के राजा ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव ने उन्हें अपने यहां दीवान नियुक्त किया और फौजी जिम्मेदारी सौंपी।
1856–57 के दौरान जब अंग्रेजों ने भारतीय रियासतों पर आक्रमण की योजना बनाई, तब ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव ने अपने वजीर पांडेय गणपत राय, दीवान शेख भिखारी और टिकैत उमरांव सिंह के साथ विचार-विमर्श कर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोलने का निर्णय लिया। इस क्रम में जगदीशपुर के बाबू कुंवर सिंह से भी पत्राचार हुआ। शेख भिखारी ने बड़कागढ़ की फौज में रांची और चाईबासा के नौजवानों की भर्ती शुरू कर दी। 1857 में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की चिंगारी पूरे छोटानागपुर क्षेत्र में फैल गई। रामगढ़ रेजीमेंट में विद्रोह हुआ, अंग्रेज अफसर को मार दिया गया और कई सिपाही शेख भिखारी की फौज में शामिल हो गए। परिणामस्वरूप रांची, चाईबासा और संथाल परगना जैसे इलाकों से अंग्रेजों को भागना पड़ा। ब्रिटिश जनरल मैकडॉनल्ड ने अपने बयान में शेख भिखारी को सबसे ज्यादा खतरनाक और बदनाम बागी बताया था। इन क्रांतिकारियों की देशभक्ति से घबराकर अंग्रेज कमिश्नर सिम्पसन को भी झारखंड छोड़कर कोलकाता भागना पड़ा। 2 अगस्त 1857 को बागी फौजों ने रांची और डोरंडा पर कब्जा कर लिया, जिससे अंग्रेजी शासन की नींव हिल गई। मो. जहांगीर अंसारी ने बताया कि 6 जनवरी 1858 को अंग्रेजों ने धोखे से शेख भिखारी, टिकैत उमरांव सिंह और उनके भाई घासी सिंह को गिरफ्तार कर लिया।
इसके बाद 7 जनवरी 1858 को चुटूपालू घाटी में एक फौजी अदालत लगाकर शेख भिखारी और टिकैत उमरांव सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई। 8 जनवरी 1858 को दोनों वीर सपूतों को बरगद के पेड़ से लटकाकर फांसी दे दी गई और वे देश के लिए शहीद हो गए। शहादत दिवस के अवसर पर ऑल इंडिया मोमिन कॉन्फ्रेंस हजारीबाग ने 8 जनवरी को हिंदू–मुस्लिम एकता दिवस के रूप में मनाने की अपील की है। संगठन ने झारखंड सरकार से मांग की है कि शहीदों के परिजनों को सरकारी सुविधाएं दी जाएं, शहादत दिवस पर उन्हें सम्मानित किया जाए तथा 8 जनवरी को राजकीय अवकाश घोषित किया जाए ताकि अधिक से अधिक श्रद्धालु शहादत स्थल पर पहुंच सकें। इसके साथ ही मोमिन कॉन्फ्रेंस ने शहीद शेख भिखारी के नाम पर छात्रवृत्ति योजना शुरू करने, हजारीबाग शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में उनके नाम से एक लाइब्रेरी स्थापित करने तथा उनकी जीवनी को विभिन्न कक्षाओं के पाठ्यक्रमों में शामिल करने की मांग की है। संगठन ने भारत सरकार से शहीद शेख भिखारी को भारत रत्न देने की भी मांग दोहराई। मो. जहांगीर अंसारी ने बताया कि शहीद शेख भिखारी के नाम पर हजारीबाग मेडिकल कॉलेज अस्पताल स्थापित करने के लिए मोमिन कॉन्फ्रेंस परिवार झारखंड सरकार के प्रति आभार व्यक्त करता है और अस्पताल परिसर में शहीद की आदमकद प्रतिमा स्थापित करने की भी मांग करता है।

