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समाजसेवी डोमन साहू का संपूर्ण जीवन जन सेवा को समर्पित रहा था

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समाजसेवी डोमन साहू का संपूर्ण जीवन जन सेवा को समर्पित रहा था

प्रखर राष्ट्रवादी, समाजसेवी डोमन साहू की सातवीं पुण्यतिथि पर विशेष

हजारीबाग

प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक समाजसेवी डोमन साहू का संपूर्ण जीवन जन सेवा को समर्पित रहा था। वे जीवन पर्यंत समाज सेवा से जुड़े रहे। आज भी उनकी जन सेवा की चर्चा होती रहती है। उनकी जन सेवा से हम लोगों को प्रेरणा लेने की जरूरत है। उन्होंने सीमित संसाधनों के बीच रहकर भी खुद के परिवार को मजबूत किया। इसके साथ ही उन्होंने कई अन्य लोगों को भी रोजगार से जोड़ा। आज उनके न होने पर भी उनकी सेवा हम सबों को समाज सेवा करने की प्रेरणा दे रही है । डोमन साहू व्यवसाय करते हुए समाज सेवा के लिए सदा तत्पर रहते थे । वे हमेशा दीन दुखियों की मदद किया करते थे। वे हजारीबाग के सांस्कृतिक एवं धार्मिक अनुष्ठानों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया करते थे। उन्होंने हजारीबाग का प्रतिष्ठित पंच मंदिर दुर्गा पूजा समिति की स्थापना की थी।
हजारीबाग के गौरवशाली पंच मंदिर की बेहतरीन के लिए आजीवन जुटे रहे थे।‌ पंच मंदिर बचाओ आंदोलन के एक कर्मठ सिपाही के रूप में भी अपनी अहम भूमिका अदा की थी । वे अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक पारिवारिक दायित्वों का निर्वाहन करते हुए समाज सेवा से जुटे रहे थे। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य और साहस को खोया नहीं। वे सदा सत्य और न्याय के पक्ष में खड़े रहते थे । वे छात्र जीवन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक स्वयंसेवक के रूप में सक्रिय रहे थे।‌ उन्होंने हजारीबाग में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। वे हजारीबाग में जनसंघ पार्टी के स्थापना के संस्थापक सदस्य थे। वे राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक थे। वे महान स्वाधीनता सेनानी, समाज सुधारक समाज सेवक महामना मदन मोहन मालवीय और अटल बिहारी वाजपेई उनके आदर्श रहे थे।

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डोमन साहू जी को समाज सेवा करने में बहुत आनंद आता था । वे समाज सेवा प्रचार कभी नहीं करते थे । कम संसाधनों में भी वे समाज सेवा किया करते थे। 1989 में जब हजारीबाग में सांप्रदायिक दंगा हुआ था, तब कर्फ्यू के दौरान पंच मंदिर मार्ग स्थित लगभग सात परिवारों के लगभग अस्सी से अधिक सदस्यों को पंद्रह दिनों तक अपने आवास में रखा था। उस दौरान डोमन साहू का पूरा परिवार सबों की खूब खिदमत की थी। इस उपकार को आज भी पंच मंदिर मार्ग निवासी भूल नहीं पाए हैं। कर्फ्यू के दौरान जहां लोग किसी बाहरी लोगों को अपने घर में घुसने नहीं देते हैं। वहीं डोमन साहू का पूरा परिवार एक महीने तक अपने घर में रहकर खिदमत की। ऐसा उदाहरण कम ही देखने को मिलता है।

हजारीबाग नगर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शाखा विस्तार में अग्रणी भूमिका निभाई थी। संघ की शाखा विस्तार में उन्होंने जीतोड़ मेहनत की थी। इस कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत सहित देश के कई प्रचारक उन्हें जानते थे। वे संघ के प्रचारकों की सेवा बहुत ही मन से किया करते थे । उनके यहां बराबर प्रचारक आया करते थे। वे सुबह और संध्या की बेला में संघ की होने वाली शाखा में नियमित रूप से थे । वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में पूरे गणवेश में जाया करते थे।

डोमन साहू जी का जन्म भारत की आजादी से लगभग उन्नीस वर्ष पूर्व हुआ था। उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन को अपने छात्र जीवन में बहुत ही नजदीक से देखा था। छोटी उम्र में घर की जवाबदेही कंधों पर आ जाने के कारण वे सीधे तौर पर स्वाधीनता आंदोलन में कूद नहीं पाए थे। लेकिन छोटी उम्र से ही वे स्वाधीनता आंदोलन के नेताओं के भाषणों को सुनते रहे थे । रामगढ़ में जब अखिल भारतीय कांग्रेस का अधिवेशन हुआ था। उस समय उनकी उम्र लगभग बारह वर्ष की रही थी । वे उस सम्मेलन में सम्मिलित हुए थे । यहां उन्हें राष्ट्रपिता महात्मा गांधी सहित देश के कई बड़े नेताओं को देखने और सुनने का अवसर प्राप्त हुआ था । इस बात का जिक्र उन्होंने मुझसे कई बार किया था। उन्होंने उस यादगार पल को हमेशा अपने सीने मे लगाए रखा। देश को आजादी मिली थी तब उन्होंने अपने घर में दीप जलाया था । डोमन साहू ने लोगों के बीच मिठाइयां बांटी थी । उन्होंने राधा कृष्ण पंच मंदिर में ढोल नगाड़ा भी बजाया था ।
देश की आजादी के बाद सत्ता पर काबिज नेताओं की क्रियाकलापों से वे बहुत दुखी हुए थे । हजारीबाग के प्रथम सांसद बाबूराम नारायण सिंह की तरह उनका भी मत था कि अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी, देश की आजादी के पार्टी रही थी, आजादी के बाद इस पार्टी का विलोपन कर दिया जाए। इसके स्थान पर एक नई राजनीतिक पार्टी का गठन किया हो। उनके इस विचारधारा के साथ देश के कई लोग सहमत थे । उनका बहुत जल्द ही अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी के नेताओं के क्रियाकलापों से मोह भंग हो गया था। चूंकि वे छात्र जीवन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए थे। देश की आजादी के बाद जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ पार्टी की स्थापना की थी, तब उन्होंने जनसंघ पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली थी। हजारीबाग जिले भर में जनसंघ पार्टी को खड़ा करने में उनकी महती भूमिका रही थी। वे शहर के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी जाकर जनसंघ पार्टी को खड़ा किया था।
वे एक राष्ट्रवादी चिंतन के व्यक्ति थे। वे सदा राष्ट्रवाद की ही वकालत किया करते थे । तब बहुत कम लोग राष्ट्रवाद के मायने को समझ पाते थे। उनका मत था कि ‘भारत में रहने वाले सभी व्यक्ति को राष्ट्रवादी होना चाहिए। राष्ट्र वाद का मतलब है, राष्ट्र की एकता और अखंडता। धर्म, पंथ, विचार से देशवासी अलग-अलग हो सकते हैं, किंतु सबों की राष्ट्र की एकता और अखंडता एक सोच होनी चाहिए । समस्त देशवासियों का राष्ट्र के प्रति पूरी निष्ठा और आस्था होनी चाहिए । राष्ट्र के प्रति निष्ठा और आस्था ही सच्चे अर्थों में राष्ट्रवाद है’।

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उन्होंने समाज सेवा को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया था । समाज सेवा और व्यवसाय, दोनों के प्रति उनकी निष्ठा देखते बनती थी। जब वे व्यवसाय कर रहे होते थे, तब एक कुशल व्यवसाई की भूमिका में होते थे। जब वे समाज सेवा में होते थे, तब खालिस समाज सेवक होते थे। आज भी हजारीबाग में होने वाले विभिन्न पर्व त्योहारों पर उनके घर में सेवा का स्टॉल लगता है। घर के मुखिया होने के नाते घर के प्रति उनकी जो जवाबदेही थी, उसका निर्वहन उन्होंने पूरी इमानदारी और निष्ठा के साथ किया था । उन्होंने अपने जीवन काल में ही सभी बेटियों की शादी योग्य वरों से कर दी थी । उन्होंने अपने दोनों बेटों क्रमस: अनूप साहू एवं प्रदीप स्नही को उचित शिक्षा प्रदान किया था। आज उनके दोनों बेटे अपने पैरों पर खड़े हैं । आज डोमन साहू की तीसरी पीढ़ी उच्च शिक्षा प्राप्त कर अच्छी नौकरी कर रहे हैं। इनके सभी पोता – पोती उच्च शिक्षा की ओर अग्रसर हैं। डोमन साहू की सहजता हमेशा लोगों को अपनी और आकृष्ट करता रहेगा। उनकी सहजता, सरलता की चर्चा आज भी होती है। वे सादा जीवन, उच्च विचार के प्रतिमूर्ति थे। वे विपरीत परिस्थितियों को अनुकूल बनाना जानते थे। वे विपत्ति के समय कभी घबराए नहीं। जब ईश्वर ने उन्हें नाम, शोहरत और धन भी प्रदान किया, तब भी उनकी सहजता बनी रही। उन्होंने बाल काल में जो समाज सेवा का संकल्प लिया था। आजीवन इस पथ पर चलते रहे। समाज सेवा के कारण ही वे 90 वर्षों तक इस धरा पर बहुत ही आनंद और शांति के साथ जीवन यापन कर पाए थे । वे मृत्यु से पूर्व तक व्यवसाय और समाज सेवा में सक्रिय रहे थे । उनके जीवन से हम सबों को समाज सेवा की प्रेरणा लेनी चाहिए ।

विजय केसरी,
कथाकार / स्तंभकार

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