मरहेता–पौता सड़क पर मातृभूमि फाउंडेशन व ग्रामीणों का सराहनीय श्रमदान, सरकार की उदासीनता के बीच लोगों ने खुद संभाली जिम्मेदारी
हजारीबाग |
मरहेता से ग्राम पौता को जोड़ने वाली जर्जर सड़क की बदहाल स्थिति को देखते हुए आज दिनांक 05 जनवरी 2026 को मातृभूमि फाउंडेशन एवं स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग से सड़क पर बने बड़े-बड़े गड्ढों को भरने का कार्य किया गया। यह सड़क लगभग 25 वर्ष पूर्व बनी थी और वर्तमान में अत्यंत जर्जर अवस्था में है। यह मार्ग हजारीबाग शहर से मात्र 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है तथा हजारीबाग सदर प्रखंड के पंचायत पौता अंतर्गत आता है।
सरकार और जिला प्रशासन द्वारा वर्षों से इस सड़क की अनदेखी किए जाने के कारण ग्रामीणों का धैर्य टूट गया। जब बार-बार मांग के बावजूद कोई ठोस पहल नहीं हुई, तब ग्रामीणों ने स्वयं आगे बढ़ते हुए श्रमदान के माध्यम से गड्ढों को भरने का निर्णय लिया। यह प्रयास ग्रामीणों की मजबूरी के साथ-साथ उनकी जागरूकता और सामूहिक जिम्मेदारी को भी दर्शाता है।
इस अवसर पर संस्था के संस्थापक दीपंक कुमार ने कहा कि सड़क की स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि ग्रामीणों को आवागमन में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। स्कूली बच्चों को साइकिल से स्कूल जाने में रोज़ परेशानी होती है, वहीं गांव के मजदूर वर्ग के लोगों को प्रतिदिन शहर काम पर आने-जाने में जान जोखिम में डालनी पड़ती है। जर्जर सड़क के कारण अब तक कई दुर्घटनाएँ भी हो चुकी हैं।
ग्रामीण सुरेश यादव ने कहा कि वर्षों से केवल आश्वासन मिलते रहे, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कोई कार्य नहीं हुआ। वहीं शैलेश यादव ने कहा कि जब सरकार और प्रशासन मुंह मोड़ ले, तब उम्मीद छोड़ने के बजाय खुद आगे बढ़ना ही एकमात्र रास्ता बचता है। मातृभूमि फाउंडेशन का साथ मिलने से यह प्रयास और भी प्रेरणादायक बन गया।
मातृभूमि फाउंडेशन के सह-संस्थापक सौरभ तिवारी ने कहा कि ग्रामीणों के सहयोग, श्रमदान और आपसी समन्वय से ही यह कार्य संभव हो पाया है। संस्था का उद्देश्य केवल सहायता करना नहीं, बल्कि समाज में सहभागिता और जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करना है।
अंत में संस्थापक दीपंक कुमार ने जिला प्रशासन एवं राज्य सरकार से आग्रह किया कि वे स्वयं स्थल पर आकर स्थिति का जायजा लें और वर्षों से प्रतीक्षित इस सड़क को प्राथमिकता देते हुए शीघ्र स्थायी निर्माण की दिशा में ठोस कदम उठाएँ।
मातृभूमि फाउंडेशन और ग्रामीणों का यह संयुक्त प्रयास भले ही अस्थायी राहत प्रदान करता हो, लेकिन यह प्रशासनिक उदासीनता के बीच जनसहभागिता, श्रमदान और सामाजिक चेतना का एक सशक्त उदाहरण बनकर सामने आया है।

