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झारखंड के उस समुदाय की दास्तान, जो साँपों में खोजता है जीवन…

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झारखंड के उस समुदाय की दास्तान, जो साँपों में खोजता है जीवन…

साँप संरक्षक बनाम कानून का दंश, झारखंड के पारंपरिक ज्ञान पर मंडराता संकट..

हजारीबाग

झारखंड राज्य सिर्फ अपनी प्राकृतिक खनिज संपदा, खूबसूरत पर्यटन स्थलों की रमणीयता और समृद्ध आदिवासी संस्कृति के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि यह वह भूमि है जहाँ भारत की प्राचीन संस्कृति और सभ्यता आज भी जीवंत होती है। इसी भूमि पर एक ऐसा समुदाय निवास करता है जिसकी पहचान एक अद्वितीय और जोखिम भरी परंपरा से जुड़ी है। इनके लिए साँपों का संरक्षण और स्नेक कैचिंग इनकी परंपरा रही है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी ये समुदाय अपनी परंपरा का बखूबी निर्वहन कर रहें हैं। यह कार्य इनके जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है जो दुर्भाग्य से अब उनके जीविकोपार्जन का एकमात्र जरिया भी बन चुका है।

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इस समुदाय को सामान्यतः लोग सपेरा या मदारी कहकर पुकारते हैं, लेकिन वास्तव में उनका कार्य केवल मनोरंजन या भीख मांगना नहीं है। ये लोग सदियों से पारंपरिक वन्यजीव ज्ञान के भंडार रहे हैं। वे साँपों को पकड़ने, उनकी देखभाल करने और सही समय आने पर उन्हें सुरक्षित रूप से जंगल में छोड़ने का काम करते हैं। इनका पारंपरिक पेशा साँपों को पकड़ना और जड़ी-बूटियों का ज्ञान रहा है। ये मानते हैं कि साँप उनके कुल देवता या संरक्षक हैं और उनका अपमान करना या उन्हें मारना पाप है।

इन समुदायों का अर्थतंत्र पूरी तरह से साँपों और उनसे जुड़ी सेवाओं पर निर्भर करता है। शहरीकरण और जंगल की कटाई के कारण, साँप अक्सर रिहायशी इलाकों में घुस आते हैं। ऐसे में लोग दहशत में आकर साँपों को मार देते हैं, लेकिन यह समुदाय यहाँ एक जीवनरक्षक की भूमिका निभाता है। वे बिना नुकसान पहुँचाए साँपों को पकड़ते हैं और पकड़े गए साँपों को उचित दूरी पर सुरक्षित जंगल में छोड़ते हैं। इस सेवा के बदले उन्हें स्थानीय लोगों से पारिश्रमिक मिलता है। इसके अतिरिक्त साँपों से जुड़ी पारंपरिक औषधियों और जड़ी-बूटियों का ज्ञान भी इनके पास होता है। हालाँकि वन्यजीव कानूनों के कारण अब विष या उसके अंगों का व्यापार लगभग बंद हो गया है, लेकिन कुछ पारंपरिक नुस्खे और जड़ी-बूटियाँ, जो सर्पदंश के इलाज में सहायक मानी जाती हैं, अभी भी उनके जीविकोपार्जन का हिस्सा हैं। कई बार सांस्कृतिक मेलों और हाट-बाजारों में ये अपने पारंपरिक कौशल का प्रदर्शन करते हैं, जिसके बदले उन्हें दान या कुछ धनराशि प्राप्त होती है।
यह जीवनशैली जितनी अनूठी है, उतनी ही चुनौतियों से भरी भी है। भारत में अधिकांश साँप वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत संरक्षित हैं। उन्हें पकड़ना, रखना या उनका व्यापार करना गैरकानूनी है और यह उनके पारंपरिक जीविकोपार्जन पर एक बड़ा संकट है।

विशेष रूप से झारखंड राज्य के बोकारो जिले के चंदनकियारी प्रखंड क्षेत्र में स्थानीय वन विभाग की अधिकारियों के सख्ती के कारण ये विषधर साँप लेकर चलना लगभग बंद कर चुके हैं। इनके सामने जीविकोपार्जन का यही एक पारंपरिक तरीका था जिससे लोगों के बीच पहुंचकर उनसे पैसा और चावल के सहारे जिंदगी चलाते थे, लेकिन अब यह रास्ता बंद हो चुका है। जहरीले साँपों के साथ काम करने में सर्पदंश का खतरा हमेशा बना रहता है और उचित चिकित्सा सुविधाओं तक पहुँच न होने के कारण कई बार दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ घट जाती हैं। इसके अतिरिक्त आधुनिक समाज में इन्हें अक्सर अंधविश्वास फैलाने वाले के रूप में देखा जाता है, जिससे इन्हें सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इस समुदाय को ‘अपराधी’ या ‘तस्कर’ मानने के बजाय, हमें इनके पारंपरिक ज्ञान का सम्मान करना चाहिए, क्योंकि इनके पास वह अनमोल ज्ञान है जो हमें बताता है कि जंगल और वन्यजीवों के साथ सह-अस्तित्व कैसे संभव है। इनकी इस पारंपरिक कला पर उत्पन्न विकट आर्थिक संकट पर स्थानीय क्षेत्र के माननीय सांसद, माननीय विधायक सहित अन्य जनप्रतिनिधियों को उचित प्लेटफार्म में आवाज बुलंद करनी ही चाहिए। राज्य सरकार, जिला प्रशासन और गैर सरकारी संगठनों को चाहिए कि वे इनके कौशल का उपयोग करते हुए इन्हें प्रशिक्षित वन्यजीव बचावकर्मी के रूप में मान्यता दें और एक निश्चित वेतन की व्यवस्था करें। साथ ही इन्हें सर्पदंश के आधुनिक इलाज और फर्स्ट-एड के बारे में शिक्षित करना भी आवश्यक है। इनके अनोखे कौशल और संस्कृति को जिम्मेदार पर्यटन के माध्यम से प्रस्तुत किया जा सकता है, जिससे उनकी आय का एक स्थायी स्रोत बन सके। झारखंड का यह समाज हमें सिखाता है कि प्रकृति के साथ हमारा संबंध केवल लेना नहीं, बल्कि देखभाल और सम्मान पर आधारित होना चाहिए। ये लोग सिर्फ साँपों को नहीं पालते बल्कि वन्यजीव और मानव के बीच के नाजुक संतुलन को बचाए रखने का प्रयास करते हैं। चंदनकियारी क्षेत्र में इन्हें लोग वैध या वैधा कहकर पुकारते हैं।

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झारखंड में जिस प्रकार से मानव और वन्यजीवों का संघर्ष बढ़ रहा है वैसे में ये समुदाय पर्यावरण और मानव एवं वन्यजीवों के संरक्षण में बेहद हितकर हैं। सर्पदंश से झारखंड राज्य में हर साल करीब 4 हजार से अधिक लोगों की मौत होती है। ऐसे में अगर सांपों के जानकार इस समुदाय के लोगों को सरकार और जिला प्रशासन प्रशिक्षित बचाव वन्यकर्मी के रूप में समायोजित करती है तो इनका जीविकोपार्जन भी होता रहेगा और इनकी पारंपरिक कला भी संरक्षित रहेगी और समाज एवं पर्यावरण को भी फायदा होगा। अब देखना होगा कि राज्य सरकार, जिला प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधि इस विलुप्तप्राय समुदाय के लिए क्या करते हैं ?

प्रस्तुति:-
✍ रंजन चौधरी,
सांसद मीडिया प्रतिनिधि, हजारीबाग लोकसभा क्षेत्र।

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