अब्दुल कयूम अंसारी के यौमे-वफात पर हजारीबाग में श्रद्धांजलि सभा, देशभक्ति और सामाजिक न्याय के संघर्ष को किया गया नमन
ऑल इंडिया मोमिन कॉन्फ्रेंस जिला कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम में स्वतंत्रता सेनानी और पूर्व मंत्री के योगदान को किया गया स्मरण
हजारीबाग
महान स्वतंत्रता सेनानी, पूर्व कैबिनेट मंत्री एवं पूर्व राज्यसभा सदस्य अब्दुल कयूम अंसारी के यौमे-वफात के अवसर पर ऑल इंडिया मोमिन कॉन्फ्रेंस, हजारीबाग के जिला कार्यालय में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता जिला अध्यक्ष मो. जहांगीर अंसारी ने की। इस अवसर पर जिला कार्यकारिणी के सदस्यों ने उनके चित्र पर पुष्प अर्पित कर खराजे अकीदत पेश की और उनके राष्ट्रवादी विचारों को याद किया। सभा को संबोधित करते हुए जिला अध्यक्ष मो. जहांगीर अंसारी ने कहा कि अब्दुल कयूम अंसारी वतनपरस्ती की मिसाल थे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई और जीवन भर राष्ट्रीय एकता, धर्मनिरपेक्षता तथा सांप्रदायिक सद्भाव के लिए संघर्ष किया। उन्होंने मुस्लिम लीग की विभाजनकारी राजनीति का खुलकर विरोध किया और एक अखंड भारत के समर्थक बने रहे।
अब्दुल कयूम अंसारी का जन्म 1 जुलाई 1905 को बिहार के शाहाबाद जिले के डेहरी ऑन सोन में हुआ था। युवावस्था में ही वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए। 1928 में उन्होंने कलकत्ता में साइमन कमीशन के विरोध में छात्रों के आंदोलन में भाग लिया। वे ऑल इंडिया मोमिन कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष रहे और जिन्ना के द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के खिलाफ संघर्ष का नेतृत्व किया। उन्होंने मुस्लिम लीग की अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग का विरोध करते हुए मोमिन आंदोलन की शुरुआत की, जिसके माध्यम से पिछड़े मोमिन समुदाय की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक उन्नति के लिए काम किया। इस आंदोलन को सफल बनाने में उनके निकट सहयोगी फ़ज़ल करीम अंसारी की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। वे न केवल एक कुशल राजनीतिज्ञ थे, बल्कि पत्रकार, लेखक और कवि भी थे। स्वतंत्रता पूर्व काल में उन्होंने उर्दू साप्ताहिक अल-इस्लाह और मासिक मुसावत का संपादन किया। उनका मानना था कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ही एकजुट भारत की स्वतंत्रता, सामाजिक समानता, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र की स्थापना के लिए संघर्ष कर रही है, इसलिए मोमिन आंदोलन ने कांग्रेस का समर्थन किया। उन्होंने कारीगरों और बुनकर समुदायों के कल्याण तथा हथकरघा उद्योग के विकास के लिए भी उल्लेखनीय कार्य किए। 1946 के आम चुनाव में मोमिन कॉन्फ्रेंस ने बिहार प्रांतीय विधानसभा में मुस्लिम लीग के विरुद्ध छह सीटें जीतीं।
इसके बाद वे बिहार केसरी श्रीकृष्ण सिंह के मंत्रिमंडल में मंत्री बने और लगभग 17 वर्षों तक विभिन्न महत्वपूर्ण विभागों का कुशल संचालन किया। ईमानदारी और निःस्वार्थ सेवा के लिए उनकी विशेष पहचान बनी। बाद में उन्होंने मोमिन कॉन्फ्रेंस को राजनीतिक दल से सामाजिक संगठन का स्वरूप दिया। अक्टूबर 1947 में कश्मीर पर पाकिस्तानी आक्रमण की निंदा करने वाले वे भारत के पहले मुस्लिम नेताओं में शामिल थे। 1948 में हैदराबाद में रजाकारों के भारत-विरोधी विद्रोह के समय भी उन्होंने सरकार का समर्थन किया। 1957 में उन्होंने इंडियन मुस्लिम यूथ कश्मीर फ्रंट की स्थापना की। राष्ट्रीय सचिव प्रो. अनवर हुसैन ने खराजे अकीदत पेश करते हुए कहा कि अब्दुल कयूम अंसारी गरीबों और वंचितों के सच्चे हितैषी थे। शिक्षा और साक्षरता के प्रसार में उनका बड़ा योगदान रहा। उनकी पहल पर 1953 में भारत सरकार ने पहला अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग आयोग गठित किया।
स्वतंत्रता के बाद वे मोमिन कॉन्फ्रेंस/जमीअतुल मोमीनीन के टिकट पर चुनाव जीतकर बिहार सरकार में मंत्री बने। 3 अप्रैल 1970 को वे कांग्रेस की ओर से राज्यसभा सदस्य निर्वाचित हुए। अब्दुल कयूम अंसारी का निधन 18 जनवरी 1973 को हुआ था। भारत सरकार ने 1 जुलाई 2005 को उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी कर उन्हें सम्मानित किया। उनकी राष्ट्रभक्ति और दलित, पिछड़े व पसमांदा मुसलमानों के उत्थान के लिए किए गए कार्यों को कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्हीं के प्रयासों से मोमिन, अंसारी, जुलाहा समुदाय को अत्यंत पिछड़ा वर्ग में शामिल किया गया। श्रद्धांजलि सभा में राज्य महासचिव मो. सलीम रजा, राज्य प्रतिनिधि मो. बाबर अंसारी, जिला महासचिव नुरुल हुदा अंसारी, जिला उपाध्यक्ष मो. फिरोज, अधिवक्ता मो. आफताब आलम, मो. सिराज अंसारी, मो. साबिर अंसारी सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे और सभी ने उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।

