आखिर क्यों मनाते है मकर सक्रांति जानिये पुरी रहस्य: शिव शर्मा
ईचाक
प्रखंड के समाजसेवी शिव शंकर शर्मा ने अपनी कलमो से बताया कि मकर संक्रान्ति भारत के सभी पर्वों में एक प्रमुख पर्व माना गया है। मकर संक्रांति पूरे भारत और नेपाल में भिन्न रूपों में मनाया जाता है। पौष मास में जिस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है उस दिन इस पर्व को मनाया जाता है। वर्तमान शताब्दी में यह त्योहार जनवरी माह के चौदहवें या पन्द्रहवें दिन ही पड़ता है. इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है। तमिलनाडु में इसे पोंगल नामक उत्सव के रूप में जाना जाता हैं जबकि कर्नाटक, केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे केवल संक्रांति ही कहते हैं। बिहार के कुछ जिलों में यह पर्व ‘तिला संक्रांत’ नाम से भी प्रसिद्ध है। मकर संक्रान्ति पर्व को कहीं-कहीं उत्तरायण भी कहते हैं। 14 जनवरी के बाद से सूर्य उत्तर दिशा की ओर अग्रसर होता है। इसी कारण इस पर्व को ‘उतरायण’ भी कहते है। वैज्ञानिक तौर पर इसका मुख्य कारण पृथ्वी का निरंतर 6 महीनों के समय अवधि के उपरांत उत्तर से दक्षिण की ओर वलन कर लेना होता है। और यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है।
मकर संक्रांति भारत की संस्कृति, विज्ञान और प्रकृति के मेल का पर्व है। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ उत्तरायण की शुरुआत होती है. जो नई ऊर्जा, खुशहाली और फसल उत्सव का प्रतीक है। खास बात यह है कि 12 जनवरी 1863 में जब स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था. उस दिन ही मकर संक्रांति का पावन पर्व था। प्रति वर्ष 14 जनवरी को सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं और इस खगोलीय परिवर्तन के साथ सूर्य उत्तरायण का आरंभ होता है। इसे मकर संक्रांति का पर्व भी कहा जाता है। भारतीय संस्कृति में यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि समय और ऊर्जा के परिवर्तन का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं। चूँकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं. इसलिए इस दिन को मकर संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है। मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं। मान्यता है कि मकर संक्रांति पर खिचड़ी का दान करने से ग्रह दोष शांत होते हैं और जीवन में स्थिरता आती है। यही कारण है कि स्नान के बाद खिचड़ी का दान कर उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करने की परंपरा बनी। यह धार्मिक भावना लोगों को संयम और सेवा का संदेश भी देती है। मौसम के बदलाव की ख़ुशी मे पतंग भी उडाने की परंपरा चलती आई है।

