पसमांदा मुसलमानों को सिर्फ़ वोट बैंक समझने की मानसिकता से राजनीतिक दलों को बाहर निकलना होगा-मौलाना अब्दुर रकीब अंसारी
झारखंड न्यूज़ 24
मनीष बरणवाल
जामताड़ा
देश में पसमांदा मुस्लिम समाज की लगातार उपेक्षा पर ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के प्रदेश उपाध्यक्ष व वरिष्ठ पसमांदा नेता मौलाना अब्दुर रकीब अंसारी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि यह एक कड़वी सच्चाई है कि भारत की मुस्लिम आबादी का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा पसमांदा मुस्लिमों का है, इसके बावजूद राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षणिक क्षेत्रों में उन्हें वह हक़ और भागीदारी नहीं मिल पा रही है, जिसके वे वास्तविक रूप से हक़दार हैं।
मौलाना अंसारी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आज देश की लगभग सभी राजनीतिक पार्टियाँ मुस्लिम वोट की बात तो करती हैं, लेकिन पसमांदा मुस्लिमों के लिए अलग और सशक्त मंच बनाने से बचती रही हैं। उन्होंने मांग की कि सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे अपने-अपने संगठनात्मक ढांचे में “पसमांदा मुस्लिम मोर्चा” का गठन करें, ताकि समाज के इस बहुसंख्यक तबके की आवाज़ सीधे निर्णय लेने की प्रक्रिया तक पहुंचे। उन्होंने कहा कि यह अत्यंत दुखद और चिंता का विषय है कि जिन पसमांदा मुसलमानों ने देश की आज़ादी से लेकर लोकतंत्र की मजबूती तक हर मोर्चे पर योगदान दिया, वही आज राजनीतिक प्रतिनिधित्व, नौकरियों, शिक्षा और संसाधनों से वंचित हैं। जो थोड़ी-बहुत भागीदारी पहले दिखाई देती थी, वह भी अब धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। मौलाना अंसारी ने कहा कि पसमांदा मुस्लिम समाज की वर्तमान स्थिति किसी से छुपी हुई नहीं है। गरीबी, अशिक्षा, बेरोज़गारी और सामाजिक हाशिए पर धकेले जाने की पीड़ा आज भी पसमांदा मुसलमान झेल रहे हैं, जबकि तथाकथित नेतृत्व कुछ गिने-चुने वर्गों तक सीमित रह गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि मुस्लिम समाज के नाम पर मिलने वाले राजनीतिक और सामाजिक लाभ चंद प्रभावशाली तबकों तक सिमट जाते हैं, जबकि बहुसंख्यक पसमांदा समुदाय को सिर्फ़ आश्वासन ही मिलते हैं।
उन्होंने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान का भी उल्लेख किया, जिसमें प्रधानमंत्री ने कहा था कि देश के पसमांदा मुस्लिमों को मुख्यधारा में लाने की सख़्त ज़रूरत है। मौलाना अंसारी ने कहा कि यह बयान न केवल महत्वपूर्ण है, बल्कि पसमांदा समाज की दशा और दिशा को बदलने का संकेत भी देता है। मौलाना अंसारी ने कहा कि यदि वास्तव में सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की बात की जाती है, तो पसमांदा मुसलमानों को सिर्फ़ वोट बैंक समझने की मानसिकता से बाहर निकलना होगा। उन्हें निर्णय-निर्माण की भूमिका में लाकर, उनकी शिक्षा, रोज़गार और सामाजिक उन्नति के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।
अपने बयान के अंत में उन्होंने अपील की कि पसमांदा मुस्लिम समाज अब जागरूक हो चुका है और अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक और संगठित संघर्ष के रास्ते पर आगे बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि जब तक 90 फ़ीसदी आबादी को उसका हक़ नहीं मिलेगा, तब तक मुस्लिम समाज का समग्र विकास संभव नहीं है। पसमांदा मुसलमानों को हाशिए पर रखकर कोई भी राजनीति ज्यादा दिन तक नहीं चल सकती।

