पेसा कानून पर बीजेपी की दोहरी राजनीति, केंद्र का कानून बताकर भी फैला रही भ्रम: संजय दुबे
बब्लू खान
लातेहार
पेसा कानून को लेकर भाजपा द्वारा फैलाए जा रहे भ्रम पर कांग्रेस नेता एवं शाह समाजसेवी संजय दुबे ने तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस पेसा कानून को केंद्र सरकार ने वर्ष 1996 में संसद से पारित किया, उसी कानून को लेकर आज भाजपा आदिवासी समाज को गुमराह करने का काम कर रही है।
संजय दुबे ने कहा कि पेसा कानून आदिवासियों की जल-जंगल-जमीन, स्वशासन और ग्रामसभा की सर्वोच्चता की गारंटी देता है। यह कोई नया कानून नहीं बल्कि वर्षों से लंबित संवैधानिक अधिकार है, जिसे हेमंत सोरेन सरकार ने साहस दिखाते हुए झारखंड में लागू किया। भाजपा को यह बर्दाश्त नहीं हो रहा कि आदिवासी समाज अपने अधिकारों को समझने और इस्तेमाल करने लगा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा जानबूझकर यह नैरेटिव गढ़ रही है कि पेसा कानून आदिवासी विरोधी है, जबकि सच्चाई यह है कि यह कानून आदिवासियों को अफसरशाही और पूंजीपतियों के चंगुल से आज़ाद करने वाला कानून है। ग्रामसभा को अधिकार मिलने से सत्ता का केंद्रीकरण टूटेगा, यही कारण है कि भाजपा बेचैन है।
इस मुद्दे पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता संतोष साव ने भी भाजपा पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि “भाजपा की नीति आदिवासियों को अधिकार देने की नहीं, बल्कि उनके संसाधनों को कॉरपोरेट घरानों के हवाले करने की रही है। पेसा कानून लागू होने से ग्रामसभा मज़बूत होगी और यही भाजपा की सबसे बड़ी परेशानी है।”
संतोष साव ने कहा कि भाजपा सत्ता में रहते हुए पेसा कानून को लागू नहीं कर पाई और अब जब राज्य सरकार ने इसे लागू किया है, तो भ्रम फैलाकर आदिवासियों को डराने का काम कर रही है।
कांग्रेस नेताओं ने कहा कि भाजपा की राजनीति हमेशा से आदिवासी समाज को डराकर, भ्रम फैलाकर और बाँटकर सत्ता साधने की रही है। अब जब आदिवासी अपने संवैधानिक अधिकारों के साथ खड़े हो रहे हैं, तो भाजपा को यह सच्चाई स्वीकार नहीं हो रही।
अंत में संजय दुबे ने दो टूक कहा कि पेसा कानून आदिवासी और मूल निवासियों के आत्मसम्मान, स्वशासन और हक-हकूक की ढाल है। इसे कमजोर करने की किसी भी कोशिश को कांग्रेस पार्टी सड़क से सदन तक बेनकाब करेगी।

