नेतरहाट से बेतला तक हरियाली का संकल्प: ‘पेड़ का रक्षाबंधन’ बना जन-आंदोलन
बब्लू खान
लातेहार।
पर्यावरण संरक्षण की दिशा में टूर एंड ट्रैवल एजेंसी लातेहार टूरिज्म (रजि) का प्रयास अब रंग लाता दिख रहा है। झारखंड की पहाड़ी नगरी नेतरहाट क्षेत्र में घटते जंगलों और बढ़ते पर्यावरणीय दबाव को देखते हुए लातेहार टूरिज्म द्वारा शुरू किया गया “पेड़ का रक्षाबंधन” अभियान आज एक प्रेरणादायक जन-आंदोलन का रूप ले चुका है।
लातेहार टूरिज़्म एवं नेचुरल एंड ह्यूमन रिसोर्स वेलफेयर फ़ाउंडेशन के संयुक्त प्रयास से शुरू हुई यह मुहिम अब नेतरहाट से आगे बढ़कर बेतला तक पहुंच गई है। खास बात यह है कि अब पश्चिम बंगाल सहित देश के विभिन्न राज्यों से आने वाले पर्यटक भी इस अभियान में सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं। नेतरहाट और बेतला भ्रमण के दौरान पर्यटक पुराने, विशाल और बहुमूल्य पेड़ों पर रक्षा-सूत्र बांधकर उन्हें किसी भी प्रकार की क्षति से बचाने का संकल्प ले रहे हैं।
आईआईटी (आईएसएम) के प्रोफेसर असीम कुमार मुखर्जी ने भी अपने नेतरहाट भ्रमण के दौरान इस अभियान में भाग लिया और पेड़ों पर रक्षा-सूत्र बांधकर लोगों से पर्यावरण संरक्षण के लिए आगे आने की अपील की। उन्होंने लातेहार टूरिज्म की पहल की सराहना करते हुए कहा कि यह अभियान न केवल भावनात्मक रूप से लोगों को जोड़ता है, बल्कि यह भी संदेश देता है कि प्रकृति की रक्षा अब किसी एक क्षेत्र की नहीं, बल्कि पूरे देश की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने चेताया कि यदि आज हम सचेत नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ियां हरियाली के लिए तरसेंगी।
इस अभियान में डॉ. सौरव मंडल, अर्पण मजूमदार, हिमांशु, आनंद राज घोष और सौगत डे जैसे पर्यटकों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और अन्य पर्यटकों को इससे जुड़ने के लिए प्रेरित किया। उनका कहना है कि नेतरहाट और बेतला की शांति, स्वच्छ हवा और हरियाली ने उन्हें यह समझाया कि पर्यटन का वास्तविक अर्थ प्रकृति से जुड़ना और उसकी रक्षा करना है।
पूरे अभियान में लातेहार टूरिज़्म के गाइड सह सारथी इसकी सबसे मजबूत कड़ी बनकर उभरे हैं। लातेहार टूरिज्म के गोविंद पाठक बताते हैं कि गाइड पर्यटकों को केवल दर्शनीय स्थलों का भ्रमण ही नहीं कराते, बल्कि जंगल, जैव-विविधता और पर्यावरण संतुलन के महत्व के प्रति भी जागरूक करते हैं। इसी कारण पर्यटक स्वेच्छा से इस मुहिम का हिस्सा बन रहे हैं। उन्होंने बताया कि आने वाले समय में इस अभियान को बेतला से आसपास के गांवों तक ले जाने की योजना है, ताकि स्थानीय समुदाय भी पर्यावरण संरक्षण की इस पहल से जुड़ सकें।

