अब कर नहीं सताएगा, प्रधानमंत्री का नया फॉर्मूला लाएगा हर चेहरे पर मुस्कान
संपादकीय-
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब 21 सितंबर 2025 की संध्या को राष्ट्र के नाम संबोधन किया तो देश की निगाहें टेलीविजन स्क्रीन और मोबाइल फोन पर टिकी हुई थीं। त्योहारों की आहट के बीच, नवरात्रि और दुर्गा पूजा की पावन छाया में यह संबोधन केवल एक सरकारी घोषणा न होकर नागरिक जीवन के हर पहलू से जुड़ता दिखाई दिया। भारतीय लोकतंत्र में जब भी प्रधानमंत्री जनता से सीधे संवाद करते हैं, तो वह अवसर सिर्फ सूचना के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं रहता बल्कि वह राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक मानस की दिशा तय करता है। यही कारण है कि इस बार भी मोदी के भाषण को सिर्फ एक कर सुधार योजना की व्याख्या मानकर टाल देना संभव नहीं, बल्कि इसे एक व्यापक राष्ट्रीय विमर्श के रूप में देखना होगा। मोदी के इस संबोधन में तीन मुख्य सूत्र उभरे। पहला, जीएसटी व्यवस्था को सरल बनाने की कोशिश, जिसके तहत अब केवल दो स्लैब पांच प्रतिशत और अठारह प्रतिशत शेष रहेंगे। दूसरा, बचत उत्सव का विचार, जिसके अंतर्गत सरकार ने दावा किया है कि इन सुधारों से जनता को लगभग ढाई लाख करोड़ रुपये की बचत होगी। और तीसरा, स्वदेशी का आह्वान, जिसमें उन्होंने नागरिकों से आग्रह किया कि वे विदेशी उत्पादों से दूरी बनाएँ और भारतीय उत्पादों को अपनाएँ। ये तीनों सूत्र मिलकर एक ऐसा नया आख्यान गढ़ते हैं, जिसमें अर्थव्यवस्था की जटिल भाषा को आम आदमी के जीवन के अनुभव से जोड़ने का प्रयास किया गया है। जीएसटी, यानी वस्तु एवं सेवा कर, 2017 में लागू हुआ था। उस समय इसे भारत की सबसे बड़ी कर क्रांति बताया गया था, क्योंकि इससे पहले देश के अलग-अलग राज्यों और केंद्र के बीच दर्जनों प्रकार के अप्रत्यक्ष करों का जाल फैला हुआ था। लेकिन शुरुआत से ही इस व्यवस्था की आलोचना होती रही कि यह जटिल है, छोटे कारोबारियों पर बोझ डालती है और कई दरों के चलते आम उपभोक्ता उलझन में पड़ जाता है।
मोदी ने अब यह स्वीकार किया कि कर व्यवस्था को और अधिक सरल और पारदर्शी बनाना समय की मांग है। दो दरों की व्यवस्था से निश्चित ही करदाताओं को समझने और व्यापारियों को लागू करने में आसानी होगी। यह कदम केवल राजकोषीय सुधार नहीं बल्कि कर संस्कृति में बदलाव का संकेत है।फिर भी सवाल यह उठता है कि क्या केवल दरों की कमी से भारतीय कर व्यवस्था न्यायपूर्ण और समान हो जाएगी। छोटे दुकानदारों, किसानों से जुड़ी आपूर्ति श्रृंखला और असंगठित क्षेत्र के करोड़ों मजदूरों के लिए यह सुधार कितना लाभकारी होगा, इसका आकलन आने वाले वर्षों में ही हो सकेगा। कर सुधार का वास्तविक उद्देश्य केवल राजस्व संग्रह नहीं बल्कि नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार होना चाहिए। मोदी ने जब इसे बचत उत्सव बताया, तो उसके पीछे यही संदेश छिपा था कि जनता की जेब में अधिक पैसा बचेगा, जिससे उपभोग बढ़ेगा और अर्थव्यवस्था में चक्र तेज होगा। बचत उत्सव शब्द का चयन राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारतीय समाज में उत्सव का अर्थ केवल धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन नहीं बल्कि सामूहिकता और आशा का उत्सव भी है। जब प्रधानमंत्री कहते हैं कि यह सुधार एक बचत उत्सव है, तो वे कर नीति को जनभावना से जोड़ने का प्रयास करते हैं। सामान्य करदाता को शायद आंकड़ों की गुत्थियां समझ न आएँ, लेकिन उत्सव और बचत की भाषा वह सहज ही समझ लेता है। यहाँ पर राजनीति और अर्थशास्त्र का वह संगम दिखाई देता है, जिसे मोदी शैली की राजनीति का विशिष्ट गुण कहा जा सकता है। स्वदेशी की पुकार भारतीय राजनीतिक इतिहास में कोई नया विचार नहीं है। महात्मा गांधी ने इसे स्वतंत्रता संग्राम का हथियार बनाया था, लोकमान्य तिलक से लेकर विनोबा भावे तक अनेक नेताओं ने इसे आत्मनिर्भरता और सामाजिक पुनर्निर्माण से जोड़ा। लेकिन वैश्वीकरण और उदारीकरण के युग में जब दुनिया की अर्थव्यवस्था एक-दूसरे से गहरे जुड़ी है, तब स्वदेशी की पुकार को केवल भावनात्मक अपील समझना भूल होगी। मोदी के स्वदेशी मंत्र में मेक इन इंडिया और वोकल फॉर लोकल की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। यह आह्वान उपभोक्ता को सीधा संबोधित करता है कि उसके खरीद निर्णय केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर असर डालते हैं। हालाँकि यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत आज विश्व व्यापार संगठन का सदस्य है, अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर उसकी निर्भरता बहुत अधिक है और निर्यात-आयात का संतुलन बनाए रखना अनिवार्य है।
ऐसे में स्वदेशी का आग्रह केवल भावनात्मक न होकर व्यावहारिक भी होना चाहिए। यदि भारतीय उत्पाद गुणवत्ता, मूल्य और तकनीक के स्तर पर प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाए, तो केवल आह्वान से उपभोक्ता की आदतें बदलना कठिन होगा। इस चुनौती का सामना करने के लिए सरकार को उत्पादन तंत्र, अनुसंधान, डिज़ाइन और विपणन में सुधार लाने होंगे। मोदी ने अपने संबोधन में त्योहारों की चर्चा करते हुए कहा कि यह सुधार उसी समय लागू हो रहा है जब नवरात्रि और दुर्गा पूजा जैसे बड़े उत्सव प्रारंभ हो रहे हैं। यह प्रतीकात्मकता भी महत्वपूर्ण है। भारतीय अर्थव्यवस्था में त्योहारों का मौसम खपत और व्यापार के लिहाज से सबसे जीवंत समय होता है। दुकानों में भीड़ बढ़ती है, उपभोक्ता नए उत्पाद खरीदते हैं और बाजार में रौनक लौट आती है। ऐसे में कर सुधार को इसी समय लागू करना निश्चित रूप से एक सुनियोजित रणनीति है। सरकार चाहती है कि जनता इसे केवल नियम या अधिनियम न माने, बल्कि अपने जीवन का उत्सव समझे। फिर भी यह सवाल अनुत्तरित रहता है कि क्या ऐसे सुधारों से देश की गहरी आर्थिक समस्याएँ हल हो पाएँगी। बेरोजगारी, महँगाई और असमानता के प्रश्न किसी भी कर सुधार से स्वतः समाप्त नहीं हो जाते। जीएसटी दरों की कटौती से उपभोक्ता को राहत मिल सकती है, लेकिन रोजगार सृजन, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च, ग्रामीण विकास और पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दों पर भी ठोस कदम आवश्यक हैं। मोदी के भाषण में इन पहलुओं का उल्लेख सीमित रहा। लोकतांत्रिक दृष्टि से यह भी महत्त्वपूर्ण है कि प्रधानमंत्री के ऐसे संबोधन केवल एकतरफ़ा न होकर संवाद का माध्यम बनें। जनता की वास्तविक आवाज़, छोटे कारोबारियों की पीड़ा, किसानों की चिंता और युवाओं की आकांक्षाएँ यदि इस सुधार की प्रक्रिया में समाहित होंगी तभी यह कदम व्यापक सफलता पा सकेगा। अन्यथा यह भी केवल एक सरकारी घोषणा बनकर रह जाएगा। एक और गहरा प्रश्न यह है कि क्या कर सुधारों से केंद्र और राज्य सरकारों के बीच वित्तीय संबंध अधिक सहज हो पाएँगे। जीएसटी परिषद भारतीय संघीय ढाँचे की एक अनूठी संस्था है, जिसमें केंद्र और राज्य मिलकर निर्णय लेते हैं। दरों में बदलाव से राज्यों के राजस्व पर असर पड़ना स्वाभाविक है। मोदी का भाषण इस बिंदु पर अपेक्षाकृत मौन रहा कि राज्यों की भरपाई किस प्रकार होगी। यदि राज्यों को पर्याप्त मुआवज़ा नहीं मिला, तो उनका असंतोष बढ़ सकता है, और इसका असर सीधे जनता की योजनाओं पर पड़ेगा। प्रधानमंत्री के संबोधन को केवल आलोचना की दृष्टि से देखना भी न्यायोचित नहीं होगा। इसमें एक सकारात्मक ऊर्जा है, जो जनता को यह भरोसा दिलाती है कि सरकार कर व्यवस्था को सरल बनाने के लिए तैयार है। लंबे समय से व्यापारी वर्ग यह मांग कर रहा था कि जीएसटी के स्लैब घटाए जाएँ। अब जब यह कदम उठाया गया है तो इसे स्वागत योग्य कहा जा सकता है। बचत उत्सव की संकल्पना जनता को कर सुधारों से जोड़ने का रचनात्मक तरीका है। यह भी उल्लेखनीय है कि मोदी ने अपने भाषण में अंतरराष्ट्रीय संदर्भों की ओर भी संकेत किया। वैश्विक आर्थिक मंदी, डॉलर की मज़बूती, तेल की कीमतों का उतार-चढ़ाव और व्यापारिक युद्धों की पृष्ठभूमि में भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थिर रखना आसान नहीं है। ऐसे में कर सुधार एक घरेलू उपाय है, जो देश की अर्थव्यवस्था को आंतरिक रूप से मज़बूत कर सकता है। लेकिन बाहरी चुनौतियों से निपटने के लिए कूटनीति, व्यापार समझौते और तकनीकी नवाचार पर भी उतना ही बल देना होगा। मोदी का संबोधन इस मायने में भी रोचक है कि उन्होंने आर्थिक सुधारों को सांस्कृतिक भाषा में प्रस्तुत किया। बचत को उत्सव बताया, कर सुधार को त्योहारों की रौनक से जोड़ा और स्वदेशी को राष्ट्रीय गर्व का प्रतीक बनाया। यह शैली उनके राजनीतिक व्यक्तित्व की पहचान है, जिसमें कठिन नीतिगत निर्णयों को भी जनता की भावनाओं से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है। यही कारण है कि उनका संबोधन केवल अर्थशास्त्रियों या व्यापारियों तक सीमित नहीं रहता बल्कि आम आदमी के दिल तक पहुँचता है। लेकिन एक लोकतांत्रिक संपादकीय दायित्व के नाते यह प्रश्न उठाना आवश्यक है कि क्या भावनात्मक भाषा पर्याप्त है। नीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उसके कार्यान्वयन की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी, प्रभावी और न्यायपूर्ण है। यदि छोटे दुकानदारों को जीएसटी पोर्टल की जटिलताओं से वही परेशानी बनी रहती है, यदि ग्रामीण क्षेत्रों में कर वसूली में भ्रष्टाचार चलता रहता है, यदि उपभोक्ता को वस्तुतः राहत नहीं मिलती, तो यह सुधार भी जनता के लिए केवल भाषण भर रह जाएगा।

